Monday, October 13, 2008

अदब की जमीन अलीगढ़ में शायरों की महफिल हुई तो सुनने वाले वाह-वाह कर उठे। रुही जुबेरी के घर पर दिल्ली के अलावा कई अन्य शहरों के अशआर तराशों ने शिरकत की।
उस्ताद शायर असीर ने कहा
मोहब्बत भी गवारा है न अब करते मोहब्बत भी
मुझे जीने नहीं देते मुझे मरने नहीं देते
बाबर इलियास ने कहा-
बहुत से लोग हैं जिनकी कोई कीमत नहीं लेकिन
अजब खुशफहम हैं बिकने को बाजारों में आते हैं
दानिश मारहरवी ने फरमाया
पहले तुम खुद को मेरे कद के बराबर कर लो
फिर मेरी बात से भरपूर अदावत करना
नसीम नूरी ने कहा कि
सकून पा न सकोगे मुझे भुलाने में
ये आग और भड़क जाएगी बुझाने से
जमाल बरनी ने कहा
दिन में वो माहताब सी सूरत, आफताबी जलाल रातों में
शबनम नसीम
आप जैसा कोई हो हम नशीं, फिर जरूरत हमें दुश्मनों की नहीं
राशिदा बाकी हया ने कहा
ये और बात कि दरिया है उसकी आँखों में
तमाम उम्र ही जिसने सराब देखें हैं

1 comment:

mathurkomal said...

दीपक बाबू चबूतरा तो बना लिया लेकिन अभी सूना पड़ा हुआ है। चारपाई बिछवाओ, पानी छिड़कवाओ, सब इंतजाम रखो तभी महफिल जमेगी-सतेंद्र बाबू